वॉशिंगटन/नई दिल्ली, 20 सितम्बर 2025 – अमेरिका ने विदेशी पेशेवरों को दिए जाने वाले H-1B वीज़ा पर बड़ा बदलाव किया है। अब इस वीज़ा के लिए आवेदकों को हर साल $100,000 (लगभग ₹88 लाख) का अतिरिक्त शुल्क देना होगा। यह नियम 21 सितम्बर 2025 से लागू होगा। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस नए शुल्क पर हस्ताक्षर किए हैं और इसे “अमेरिकन जॉब प्रोटेक्शन इनिशिएटिव” का हिस्सा बताया है। आइए हम आपको H-1B वीजा के बारे मे detail मे बताते है |
H-1B वीज़ा क्या है?
H-1B वीज़ा एक गैर-आप्रवासी कार्य वीज़ा है जो विदेशी पेशेवरों को अमेरिका में काम करने की अनुमति देता है। यह वीज़ा मुख्य रूप से उन लोगों को दिया जाता है जिनके पास specialty occupation में डिग्री या कौशल हो। सबसे ज्यादा H-1B वीज़ा IT और टेक्नोलॉजी सेक्टर में इस्तेमाल होते हैं। और आप डायरेक्ट H-1B वीज़ा के लिए applay नहीं कर सकते | कोई U.S. company आपको hire करती है और आपके लिए H-1B petition file करती है।
- अवधि: 3 साल (अधिकतम 6 साल तक बढ़ाया जा सकता है)
- प्रायोजक: केवल अमेरिकी नियोक्ता (Employer Sponsorship)
- परिवार: H-1B धारक अपने परिवार को H-4 वीज़ा पर अमेरिका ला सकता है
भारतीय नागरिक H-1B वीज़ा धारकों में सबसे आगे हैं। 2024 के आंकड़ों के मुताबिक, जारी किए गए H-1B वीज़ा में से करीब 71% भारतीयों को मिले थे।
नया शुल्क नियम क्या कहता है?
अब H-1B वीज़ा धारकों को $100,000 का वार्षिक शुल्क देना होगा। करीबन 88 लाख रुपए यह शुल्क आवेदन शुल्क ($185) और अन्य चार्ज से अलग होगा। यानी कुल मिलाकर एक आवेदक को $100,185+ प्रति वर्ष का खर्च उठाना पड़ेगा।
- लागू तिथि: 21 सितम्बर 2025 से
- लागू क्षेत्र: सभी H-1B वीज़ा धारक (नए और renewal दोनों)
- छूट: हेल्थकेयर और इंजीनियरिंग क्षेत्रों में काम करने वालों को आंशिक छूट
उद्देश्य: अमेरिकी कंपनियों को विदेशी श्रमिकों की बजाय अमेरिकी श्रमिकों को प्राथमिकता देने के लिए प्रोत्साहित करना |
H-1B वीज़ा का इस्तेमाल किन क्षेत्रों में होता है?
मुख्यतः H-1B वीज़ा का उपयोग निम्नलिखित क्षेत्रों में होता है: इसका प्रकार टेबल मे देख सकते है |
| क्षेत्र | उदाहरण / कंपनियां |
|---|---|
| IT और सॉफ्टवेयर | TCS, Infosys, Wipro, Microsoft, Google, Amazon |
| इंजीनियरिंग | Civil, Mechanical, Electrical, Robotics |
| स्वास्थ्य देखभाल | डॉक्टर, नर्स, मेडिकल रिसर्चर |
| अकादमिक / रिसर्च | University professors, researchers |
| फाइनेंस / बिज़नेस | Investment banking, Accounting, Data Analysis |
भारतीय कंपनियों पर असर
भारतीय IT कंपनियां जैसे TCS, Infosys, Wipro और बड़ी अमेरिकी कंपनियां जैसे Microsoft, Amazon, Google, JPMorgan इस बदलाव से प्रभावित होंगी। इन कंपनियों में हजारों भारतीय H-1B वीज़ा पर काम कर रहे हैं। और उनके लिए ये एक बड़ी चुनौती है |
- कर्मचारियों को सलाह: कई कंपनियों ने अपने H-1B कर्मचारियों से कहा है कि वे 21 सितम्बर से पहले अमेरिका लौट आएं ताकि नए शुल्क से बच सकें।
- कंपनियों की रणनीति: कुछ कंपनियां यह शुल्क खुद भरेंगी, लेकिन कई कंपनियां इसे कर्मचारियों पर भी डाल सकती हैं।
भारत सरकार की प्रतिक्रिया
भारत सरकार ने इस कदम पर चिंता जताई है। भारतीय व्यापार निकायों का कहना है कि यह निर्णय भारतीय प्रोफेशनल्स के लिए नुकसानदायक है और इससे दोनों देशों के बीच टेक्नोलॉजी सेक्टर में सहयोग प्रभावित हो सकता है।
भारत ने अमेरिका से इस फैसले पर पुनर्विचार करने और भारतीयों के लिए छूट देने की मांग की है।
असर और भविष्य
- भारतीय IT सेक्टर: सबसे बड़ा असर इन्हीं पर होगा क्योंकि भारतीय कंपनियों के हजारों कर्मचारी H-1B वीज़ा पर अमेरिका में हैं।
- विदेशी प्रतिभा का पलायन: उच्च शुल्क के कारण कई पेशेवर अमेरिका जाने के बजाय कनाडा, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया को चुन सकते हैं।
- अमेरिकी कंपनियां: वे भी विदेशी टैलेंट को हायर करने से पहले दोबारा सोचेंगी, जिससे टेक इंडस्ट्री की ग्लोबल टैलेंट पाइपलाइन प्रभावित हो सकती है।
निष्कर्ष
अमेरिका का यह नया फैसला न सिर्फ भारतीय पेशेवरों बल्कि पूरी IT इंडस्ट्री के लिए एक बड़ी चुनौती है। $100,000 का वार्षिक शुल्क काफी ज्यादा है और इससे अमेरिका में काम करने का सपना देखने वाले लाखों युवाओं पर असर पड़ेगा। अब देखना होगा कि आने वाले महीनों में भारत और अमेरिका के बीच इस मुद्दे पर क्या कूटनीतिक हल निकलता है। ये देखने वाली बात होगी | लेकिन फिलहाल मे जो लोग H-1B वीजा लेकर रह रहे है उनके लिए ये चिंता का विषय है |
इन सभी मामलों मे आपकी क्या राय है हमे जरूर बताए ऐसे ही informational न्यूज के लिए जुड़े रहिए SochExpress के साथ |
Image Source: Official White House Photo (Public Domain)
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